Saturday, September 20, 2008

अब छलकते हैं ...


सागर से न हुआ वफ़ा हम से, मगर लेहेरें अस्कों के अब भी उठते है
वो बूंद थे अब सागर हैं ,और पैमाने-ऐ- मोहब्बत से .....अब छलकते हैं

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मेरी दास्तां ...

  क्या बताऊँ मैं अपनी दास्ताँ, ए दोस्त  हर मोड़ पे किसी अपनों ने ही आजमाया है....