Wednesday, August 06, 2008

झम झम बरसे

केह्दो उन फिजाओं से बरसना है तो झम झम बरसे

बूंदों के मोहताज़ हो वो हम नहीं ,

हमने तो समंदर आँखों मे पाला है

अब दरिया की गहराई काफी नही

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मेरी दास्तां ...

  क्या बताऊँ मैं अपनी दास्ताँ, ए दोस्त  हर मोड़ पे किसी अपनों ने ही आजमाया है....