Friday, December 05, 2008

एक सपना रोज़ पाल लेता हूँ


एक अनहोनी की आड़ में मैं एक सपना रोज़ पाल लेता हूँ

थामे दामन उम्मीद का, रोज़ मौत से ज़िन्दगी छीन लेता हूँ

यूँ तो मोहब्बत में मैं सदियाँ जी लेते और हो जाता बदनाम

पर हमेशा बिछड़ के उससे इज्ज़त से मैं रोज़ मौत पी लेता हूँ ...

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