वक्त बेवक्त तुम यूँ याद न आया करो
यूँ ही हमसे खामोशी भी ना छीना करो
केहनी थी जो बातें दिल की कभी तुम्हें
यूँ यादों मे आके उन्हें कुरेदा न करो...
वे एक समंदर खँगालने में लगे हुए हैं, हमारी कमियाँ ढूँढने में लगे हुए हैं। जिनकी अपनी लँगोटियाँ तक फटी हुई हैं, वे हमारी पगड़ी उछालने में लगे...
wah..kuch or mehnat kijiye shayri par....
ReplyDeleteShukriya...
ReplyDeleteHukm sar aankho par...
-jr