भगवन नाम की चीज़ से आज मे बड़ा परेशान हूँ। आप बोलेंगे क्या अजीब प्राणी है यह; सारी दुनिया जिसको पूजता है जिसकी रेहेम को तरसता है उसी से ये परेशान है ॥ पर क्या करूँ यारों उलझन ही कुछ ऐसी है , सुन लीजिये पहले शायद आप मेरी मदद कर सकें। दोस्तों मेरी समस्या यह है के मे किस किस को पूजूं ? मुझे याद है जब मे छोटा था मेरे घर मे शिव जी की पूजा अर्चना बड़ी धूम धाम से होती थी और होगी क्यूँ ना पंडितों का घर हो और वो भी शिव जी को पूजने वाले तो यह बात तो जायज है। तो हुआ यह के मे जो की बड़ा बाचाल और भोला था तब शिव जी को पूजने लगा ..फिर मैंने कौतुहल मे पूछा तो गणेश जी के बारे मे सुना और माँ पारवती के बारे मे भी सुना और इस ग्यान को सर्वेसर्वा मान कर उनकी पूजा करने लगा। फिर मेरे मनमंदिर मे विष्णु जी का प्रवेश हुआ और मैंने उनके अवतार और लीलाओं के बारे मे जाना तो थोडा उनकी तरफ भी आकर्षित हो गया। और ये सब रामायण और महाभारत की पढाई के दौरान हुआ। फिर मैंने मातारानी के हजारो रूप के बारे मे जाना और आज्ञाकारी बालक की तरह उनकी भी पूजा करने लगा। फिर मैंने कुछ भक्त और सेवक भगवानो के बारे मे जाना जैसे की अपने बजरंगबली , गरुड़ महाराज , अरुण देव इत्यादि इत्यादि। और क्यूँ की मेरा मन भी मेरे भगवानो के लिए उतना ही भक्ति भाव से भरा था तो उनसे भी मुझे लगाव हो गया। और इस सन्दर्भ मे मैंने बहूत सारी अच्छी बातें सीख ली। फिर मुझे पुराण से जुड़े हर व्यक्ति विशेष(कुछ राक्श्यसो को छोड़ के) से प्रेम हो गया और मे भक्ति भाव से भर गया। पर एक प्रश्न निरंतर मेरे मन मे उठता रहा के मे किस को पूजूं क्य्यों के मे सोचता था के किसी एक भगवन को पूजूंगा तो मेरा पूरा ध्यान उनके लिए एकत्रित हो जाता है और मे अन्य देव देवियों को निराश करूँगा। कभी मे गणपति के भक्ति मे लीं होता हूँ तो शिव जी फिर विष्णु जी फिर बजरंगबली और मातारानी का ख्याल दीमाग मे आता है और मे कहीं एकाग्र चित्त से किसी की भी आराधना मे अपने आप को व्यस्त नहीं कर पाता । मेरे भगवन को मेरी ये परिस्थिति शायद कुछ कम लगा तो उन्होंने मेरे जीवन मे अपने बारे मे कुछ और ज्ञान बर्षा कर दी और मे जो की पहले से ही एक अजीब प्रहेलिका को लेके परेशान था , अब कहीं का नहीं रहा। अब देखिये हुआ क्या ; मे जब ८बि काश्य मे था तब मुझे जेजुस च्रिस्ट जी केबरे मे जन ने का सौभाग्य मिला और मे भी उनके बारे मे जान कर भक्ति मे गद गद हो गया। अब मेरे भक्ति के प्याले के एक और ग्राहक की बहोत्री हो चुकी थी और मेरा मन यह निष्पत्ति लेने मे नाकाम था के कौन इस का स्वामी है। शायद भगवन को भी मेरा ये समस्या रास अरे गयी तो उन्होंने मुझे शिख धर्म से परिचि करवा दिया। फिर मे इस्लाम से परिचित हुआ। कहीं गुरु की वाणी ने मुझे मोहित किया तो कहीं इस्लाम की एक अल्लाह मे बिस्वास ने मेरा मन मोह लिया। इन सब भगवन ( गणेशा,शिव जी, मातारानी, विष्णु जी, बजरंगबली, जेसुस च्रिस्ट ,नानक देव,और अल्लाह ) जब मेरे दिल-ओ-दीमाग मे छाए हुए था तभी सिस बाबा ने मेरे दिमल मे दस्तक दिया और अपनी सरल परन्तु सत्य बचन से मेरा मन मोह लिया। अब मेरा दिल भी क्या करता किसीको छोड़ भी नहीं सकता और न ही किसी को कम अंक सकता इसलिए इस गणित मे जुट गया के किस भगवन को कितना देना है ... अब मेरे भाई ये कोई कम परेशानिवाली बात थोड़े ही है ... मुझ पर हसना मत प्यारो जितना समय लगाता हूँ इस काम मे उतना ही ज्यादा भागिदार मेरे दिल मे आते है और मेरी भक्ति बहूत कम पड़ रही है .... कृपा करके कोई उपाय बताओ और मेरी मदद कर मुझे आप्यायीत करें ....
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Adab se..
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