Friday, June 12, 2009

जिंदगी से पंगा

मैंने कभी अपनेआप को प्रतिद्वंदी के रूप मैं खड़ा नहीं पाया है। अभी जब जिंदगी मुझसे दो दो हाथ कर रही है तब मैं कमर कस रहा हूँ। भले ही मैंने अपनी जिंदगी अपने शर्तो पर जिया है पर मुझे अभी तक जिंदगी मैं कुछ रूचि नहीं है। सफलता मुझ से अब भी कोशो दूर है और मैं उसे किसी भी हाल मैं हथिआय्ने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता। भले मुझे जिंदगी ने खूब धोके दिए हो पर मैंने हमेशा जिंदगी को आडे हाथ लिया है। अपनी गलतियों से सीखा है और मेरे आस पास के लोगों को भी इससे आगाह किया है। अब जब जिंदगी थोडी सुस्त पड़ रही है मैंने फिर जिंदगी से पंगा लेने की कोशिश कर रहा हूँ। मेरे सर पे अब कुछ करने का जूनून सवार है। मुझे पता है अगर में अपने आई पे आ गया तो किसी मंजिल को गुलाम बनाना मेरे लिए मुश्किल बात नहीं है मगर तलाश है तो बस एक सही दिशा की है और एक मार्गदर्शक की कमी मुझे सता रही है। वैसे तो में हमशा सुभ्चिन्तकों से घिरा हुआ हूँ मगर इस नस्वर शरीर में छुपा शैतान की पहचान मुश्किल है । पर में द्रिध्प्रतिग्य हूँ और मेरा लक्ष्य अब तय दीख रहा है । मुझमें अब उमर के साथ साथ सफलता की भूख भी बढ़ रही है और में उसे हासिल करने के लिए बेताब हूँ। इश्वर करे के मुझे एक मार्गदर्शक और सफला अतिशीघ्र प्राप्त हो ।

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