Monday, March 21, 2011

२१ मार्च २०११

कुछ वक़्त बीत गया था मेरे खयालो मे खोये हुए तभी राजेश ने मुझे पीछे से आवाज़ दी और सुनसान उस विचार कक्ष्या मे उसक आवाज़ जैसे मेरे कानो में गूँज रहे थेमें हड़बड़ी मे उठ खड़ा हुआ और आपने मूल स्वरुप मे गयाअक्सर मेरे साथ ऐसा होता है की में एक जगह पे होते हुए भी कहीं खयालो मे चला जाता हूँ और मुझ खुद भी स्थान और पात्र का समझ ही नहीं रहताऔर हमेशा ऐसी परिस्तिती में में किसी एक वाकी के साथ अपने आप को जोड़ लेता हूँ और सपनो में कुछ दूर चला जाता हूँऔर आज भी जब में खयालो से वापस आया तो MUझे लगा के में जैसे एक सपने से बहार आया हूँ और वो सरे ख्याल मेरे आँखों के सामने एक दुर्लभ प्रतिचाबी की तरह दौड़ गईमें समझ नहीं पाया के ये क्या हो रहा था पर मुझे अच लगाआज इस सन्दर्भ में मेरे खयालो में रिश्तों मे उलझ गया थाआज ही सुबह जब में भगबत गीता का पाठ किया तो उन पंक्तिवों में संजय को भगवन श्री कृष्ण की अति दुर्लभ विश्वरूप का वर्णन करते हुए पाया जिसमे संजय ध्रितराष्ट्र को समझा रहे थे की सहस्र कलेबर में प्रभु सहस्र रूप में देव से दानद तक, काल से प्राणी तक का बयां कर रहे थेऔर ये बरनन सुन के अर्जुन का मोह भंग होता हैपर में क्यूँ आज रिश्तों में उलझ गया , शायद ये मेरे इंसानी स्वरुप का मूलाधार हैपर में कुछ परेशान भी हो गया थापर जैसे ही सपने से बहार दुनिया कुछ अलग होता है और मेरा तो ये सिर्फ कल्पना ही थी - तो में भी स्तिताप्रग्य हुआ और काम में आगे बढ़ गया...

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