Tuesday, October 07, 2008

कैसा मंज़र ये मोहब्बत दिखाता है !!!


बड़े दिनों बाद कलम ने लिखने का और आंखों पढने का मन बनाया है। दिल के यादों के पन्नो को कागज़ बना के दिल के कलम से रूह ने मेरी अपने जज्बातों का पिटारा खोला है। जाने कैसी कुछ पल की वो साथ था उसका क्या दिल क्या जान ख़ुद खुदा भी उस खुशनुमां मेरी अंदाज़ से कुछ हैरान सा था। पर कुछ भी हो मेरा साथ उससे और हमारा खुदा को शायद किसी अमावस की रात मैं चादनी की तराह महसूस हुआ। मैं कुछ पल उसके साथ को जो तरसता था होके उसका ज़माने को भूल उसमे खोया था। कमबख्त जाने कैसे उस नामाकुल सैतान को इसकी भनक लगी और कैसा केहर उसने बरसाया। करके दूर मुझसे उसको जैसे मुझसे ज़माने का क़र्ज़ दुखों का मुझसे वसूला है। खो के उसका साथ मैं अब न जाने कब आने वाली मौत को अपने मे समाने को उत्सुक हूँ। वक्त इस ठहराब से कुछ परेशान सा लगता है और मुझसे मोहब्बत का कुछ पथ सीखने को बेताब भी है। पर ना मौत न वक्त और न हम कहीं रुकते हैं ...साथ जमाने के गम हम कहीं एक दूर लंबा सफर मे निकलते हैं .सुना है फिर भी दूरीयां मिटती नहीं उलटी ये दूरियाँ मोहब्बत मैं अपना मकाम बना लेती हैं और हस्ते जीते हुए इंसान की दिलकी गहराई को और गहरा कर गम के उसमे बसाती है । जाने कैसे ये होता है ये मोहब्बत पर ना होए तो खामी और हो जाई तो इज्ज़त बन जाती है । मोहब्बात पर हर मंज़र पे शिकस्त नहीं होता और न ही हर दिल ओ जान को मंजिल देती है । किस्मत केह्के कुछ लोग इसे सर माथे पे बिठाते हैं और ज़हर इसका ज़िन्दगी भैर पीते हैं। मिले खुदा एक दिन तो पूछता मैं उससे ये कैसा नसीब बनाया है और ये कैसी मोहब्बत। करता तो मैं भी हूँ उस खुदा से मोहब्बत जबसे संभाला है होश पर जाने क्यों अब उसका मंजार भी पहले से कुछ कम लगता है...मोगाब्बत ये कैसा मंज़र दिखाता है ...मोहब्बत ये कैसा मंज़र दिखाता है ...

No comments:

Post a Comment

Srirangam Perumal.

I have always been inclined towards the spiritual and cultural heritage of Tamilnadu and the great and magnificent temple architecture and I...