Wednesday, October 29, 2008

जय जगन्नाथ...

सुबह ४ बजे का समय था जब मेरा अलार्म बज उठा। मैंने माँ को उठाया और उन्हें तैयार होने को कहा। फिर मैं ओस गया। माँ के बाद छोटा भाई और फिर मै नहा के तैयार हुआ और स्टेशन की तरफ़ चल पड़े। सुबह की third D.M ( daily Mail) हमारा इंतज़ार मैं बेचैन हो रहा था। हमने प्रभु का नाम लिया और सफर की सुरुवात की। ट्रेन चल पड़ी और हम लोग एक अनजानी ख़याल मैं दुबे खुस थे। गाड़ी धीरे धीरे एक के बाद एक स्टेशन से होते हुए खुर्दा रोड पर ११ बजे पहंची। पर तब तक दो कोन्नेतिंग ट्रेन जा चुकी थी। तो हमें अध घंटा इंतज़ार के बाद संबलपुर-पुरी एक्सप्रेस ट्रेन मिली और हम उसमे जल्द ही बैठ गए। धीरे धीरे हम पुरी स्टेशन पर पहंच गए, तब समय लगभग एक बज रहा था। भले अक्टूबर का महीन अता पर समुद्री तट का होने के हेतु सूरज भी अपने जोरो पर था। हमने जुटे और छप्पर सही जगह रख दिया और मन्दिर की तरफ़ पैर बढ़ा लिया। ये पुरुषोत्तम क्षेत्र का मेरा और मेरी माँ का प्रथम दर्शन था और तभी एक अलग उन्माद और उत्साह मे मन बिचलित सा था। जगत के नाथ जगन्नथ की दर्शन हेतु मन जैसे कुछ ब्याकुल था हमने भक्तिपुत मन से अरुण स्तम्भ को पर किया और मुख्या मन्दिर की और अग्रसर हुए। बिच मैं बिमला मन्दिर और मदन मोहन से भी मिलने का इरादा जताया तो उनके भी दर्शन किए... अब हमसे रहा नहीं जा रहा था ... पैर जैसे अपने आप भगवानकी दर्शन हेतु आगे बढ़ रहे थे और हम भी उस उन्माद मैं चले जा रहे थे। धीरे धीरे बाईस पहच चढ़ने के बाद हम शिन्हाद्वर के पास पहंचे और मन्दिर मैं प्रबेस किया । तब भक्ति मैं बिलीन भक्तों का एक जत्था हमारे संपर्क मैं आया और हम भी बिना रुके उस भीड़ का हिस्सा होने मैं अपने आप को रोक न सके। भीड़ धीरे धीरे भगवन के दर्शान हेतु आगे बढ़ता चला गया और हम भी मस्त हो कर जय जय कार के साथ चलते गए। समय था दोपहर की आरती का। अतः हमें आरती लेने का सौभाग्य भी मिला। समय के लिए लगा की भगवन स्वयं वहां धरती पे विराज्मा थे। क्या अलौकिक दृश्य था ... स्वेट वस्त्र पहने प्रभु बलभद्र ,पीले वस्त्र मैं माँ सुभद्रा और काले वस्त्र मैं अपने सारे अभुशानो के साथ स्वयं प्रभु जगन्नाथ अपने कमनीय नयनो से जैसे हमसे भक्तिपुत श्रद्धा का आवाहन से हमें आशीष प्रदान कर रहे थे... क्या अद्भुत दृश्य था वो। बरसो के बाद जैसे भक्त और भगवन भीड़ मैं एक दुसरे से गुफ्तगू मैं बिभोर थे। क्या मन्दिर था ,क्या क्या भगवन और क्या उनके भावः .... एक नैसर्गीक अनुभव मैं मेरे दोनों हाथ ऊपर उठ गया और मैं हाथ जोड़ कर प्रभु के इस अवतार के दर्शन कर रहा था और अपने आको धन्य महसूस कर रहा था। ... मन तो नहीं था पर बाकि भक्तो के दर्शन के लिए हम मुख्या मन्दिर से बहार अये और अन्य मंदिरों के दर्शन किए। फिर हमने महाप्रसाद सेवन करने के लिए आनंद बाज़ार गए और बड़े प्रतीक्षा के बाद ४ बजे अबाधा भोजन किया और वापस स्टेशन की तरफ़ चल पड़े। वापसी मैं माँ ने कुछ खरीददारी की और हम फिर वापस ट्रेन मैं बैठ के घर की तरफ़ चल पड़े। वापसी मैं मैं यही सोच रहा था के क्या अनुभव था वो ...मन जैसे भक्ति मैं गद गद हो उठा था... जय जगन्नाथ...

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Srirangam Perumal.

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