Sunday, January 13, 2013

गणतांत्रिक संबिधान के बिकल्प

पिछले महीने दिल देहला देने वाले एक किस्से ने मुझे क्या सार देश को हिल के रख दिया। जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ राजधानी दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार के बारे मैं। इस पूरे घटना मैं आम आदमी से लेके सांसद और मंत्री तक सबने आपत्ति जाहिर किया और प्रमुख सेहेरों मैं तो इसके खिलाफ प्रदर्शन और नारेबाजी भी हुई और अब भी हो रहा है। इसी बीच पीड़ित महिला ने दम तोड़ दिया और पूरे ब्यबस्था और हमारे सामाजिक चाल चलन पर एक बड़ा सवालिया निशाँ छोड़ गयी।  वो भी देश की राजधानी मैं जहां सारा न्यायतंत्र को चलाने वाले बैठे रहते है। 

दुख इस बात का है की जब सारे लोग भिन्न भिन्न तरीके से अपना विरोध व्यक्त करते है तभी कुछ ऐसे भी बेबकूफ लोग भी है जो की बिना सोचे समझे कुछ भी बोल देते है और बाद मैं माफ़ीनाम भी पढ़ लेते है। ऐसे बोले वाले और कोई नहीं कुछ सिरफिरे मंत्री और बिधायक ही है। सत्ता का बल कहें या फिर उनका गरूर कहें इस प्रजाति के प्राणी जाने कब ऐसी घटनाओं को समझेंगे। यूँ तो हम अपने आप को 21बी सदी के  आईटी युग के modern  लोग कहते है और काम करते हैं आदि मानव की तराह।

इसके प्रतिकार क्या है इस सवाल के मुझे बहत सारे जवाब मिले ; जैसे की अपराधी को फंसी दे दो या फिर जिंदगी भर के लिए नपॊन्शक बना देना वगेरा वगेरा। पर क्या सभ्य समाज मैं ये संभव है और है भी तो क्या हम एक सामजिक तरीके इसका सही उपयोग कर पाएंगे। 

अब समय आ गया है के हमें कुछ शक्त कानून बनाएं और ऐसी सामाजिक समस्याओं को शक्ति से निपटे। आंबेडकर की लिखी हुई कानून बाबा आदम की जमाने की थी जीपे चलके हमारे न्यायलय मैं आज 20लाख केस फाइलों मैं दबी है और इनकी तादात दिन बा दिन बढ़ ही रही है। अभी हमें कुछ अलग सा करना होगा और जाने कई सालों से फाइलो मैं बंद पड़ी केस को खोल के सुनवाई भी हो।

और एक बात कहना चाहूँगा के आज कल जब हम अपने आपको इन्टरनेट और तकनिकी ज्ञान का भडार मानते है बलात्कार जैसे घिनोने अपराध क्यूँ बढ़ रहे है। इसके सन्दर्भ मैं बहत लोग है जो की देह ब्यापार को कानूनी जमा पहनाने की वकालत करते है और कुछ तो इसके लिए फांसी जैसी सजा का भी पक्ष  मैं है। मेरे ख़याल मैं अब समय आ गया है की हमें सेक्स के बारे  मैं चर्चा करना चाहिए और सारी  जानकारियाँ उपलध कराना चाहिए। वैसे भी यह सब उपलब्ध है पर हमें सेक्स एजुकेशन को नियमित रूप से स्कूल और कॉलेज मैं लागू करना होगा।

यह तो थे कुछ प्रिवेंटिव एक्शन पर अगर ऐसा कुछ होता है जो की दिल्ली में हुआ या फिर और किसी सेहर में होता है तो सबसे ज्यादा जो उटपटांग होता है वो है इसके ऊपर बयानबाज़ी। चाहे वो मंत्री हो या वो जो अपने आप को धर्मप्रचारक कहता है वो भी बाज़ नहीं आते। बिषय की गंभीरता से परे मूह खोल देते है और कुछ ऐसा बोल जाते है की बाद मैं माफीनामा भी पढने को हिचकिचाते नहीं। ऐसे मूर्ख इंसानों की तादात आजकल कुछ ज्यादा है। और  IT  के इस जमाने मैं जहां Information  चुटकी मैं हजार मील की दुरी तय कर लेता है इस सब मूर्ख लोगों की बात आम आदमी तक पहंच जाती है। हम एक गणतांत्रिक देश है जहां अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार सबको है पर ऐसी घटना के ऊपर अपनी गन्दी सोच और जवान का उपयोग करके शीर्षक बनना एक कुत्सित अभिलाषा से ज्यादा और कुछ नहीं। मेरे हिसाब से हो जाये कुछ बलात्कार ऐसी नेताओं के परिजनों के साथ तो फिर शायद इन्हें इसकी गहराई की समझ आये।

मैं किसी पक्ष के साथ नहीं हूँ और ना ही किसी से डरता हूँ मगर मैं इस बर्बरता के खिलाफ हूँ और इसकी निंदा करता हूँ और चाहता हूँ की हमारी गणतंत्र मैं ऐसी घटनाओं से निपटने हेतु शक्त से शक्त प्राबधान हो और नारी और पुरुष सभी सुरक्षित और खुशहाल हो।

जय हिन्द ...

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