आज एक दृश्य ने आँखों को नम कर दिया।
मध्य प्रदेश का एक वीर आज देश की रक्षा करते हुए शहीद हो गया। उनका यह सर्वोच्च बलिदान हमारी स्वतंत्रता और संप्रभुता को समर्पित है। पूरे देश की ओर से मैं उन्हें नमन करता हूँ।
लेकिन मेरे दोस्त, क्या आप जानना नहीं चाहेंगे कि इस आज़ादी की कीमत हमारे इस भाई ने कैसे चुकाई?
जब उनका पार्थिव शरीर अंतिम संस्कार के लिए घर पहुँचा, तो वहाँ उनका इंतज़ार कर रही थी—सिर्फ़ 8 घंटे पहले जन्मी उनकी नन्ही बच्ची और उनकी पत्नी, जो प्रसव पीड़ा के बाद स्ट्रेचर पर लेटी हुई थी।
वो क्षण दिल को चीर देने वाला था, जब उनकी पत्नी को स्ट्रेचर पर लाया गया, गोद में उस मासूम को लिए हुए। वहाँ मौजूद हर आँख में आँसू थे, साहब।
क्या यही विधि है? शायद हाँ... और उस पर हमारा नियंत्रण नहीं है।
लेकिन याद रखिए—आज़ादी की कीमत चरखे से नहीं चुकाई गई, साहब। किसी ने अपनी ज़िंदगी देकर चुकाई है।
ज़रा सोचिए, हमारी ज़िंदगी की कठिनाइयाँ इसके सामने कितनी छोटी हैं...
मेरे दोस्त, धन्यवाद दीजिए, आभार व्यक्त कीजिए, और नमन कीजिए ऐसे बलिदान को।
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