Tuesday, September 21, 2010

दोपहर की आतिशबाजी

बड़े दिनों बाद वापसी कर रहा हूँ ब्लॉग मेकुछ अजीब अजीब सा लग रहा है पर अपने ब्लॉग मे खुल के लिखने मे मज़ा आता है
आज मे ऑफिस मे बैठा थाअचानक आतिशबाजी सुनाई दी और ढोल भी बज रहे थेमे उठ के देखा और हैरान रेह गयामेरे मन मे कौतुहल को मेरे साथ बैठे राम सर और विनोथ दोनों ने अजीब तरीके से प्रतिक्रिया दीये नज़ारा शमशान की तरफ जाती हुई एक व्यक्ति की आखरी सबारी थीएक सुसज्जित रथ मे जो की पुष्पमालाओं से ढाका हुआ ये सबरी पूरे भीड़ मे जा रही थीकुछ लोग इस सबारी के आगे नाच भी रहे थे और मेरे हिसाब से वो लोग मदिरा के नशे मे धुत थेमैंने जब पूछा के ऐसा क्यों करते हैं तो राम सर और विनोथ ने कहा के तमिल लोगों मे इस सबारी को हसी खुसी घर से शमशान तक बिदाई देने का रिवाज़ हैकैसे कैसे रिवाज़ है हमारे यहाँ , किसीके जाने पे दुःख तो बहूत होता है मगर रिवाजों ने हमें खुसी मानाने पे मजबूर करते हैं...

2 comments:

  1. life to god banata hain us main uski marjee, but tradition to hum logo ka bana huaa hain, to nibhane main dukh kyu lagega.......... born hone se log khusss or mane se v log khuss. ajab sa tradition hain.......

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  2. shayad aap logo ko pata nahi he. ye khushi bhi kisi kisi ko hi naseeb hoti he.aese dhum dham se bidhai sirf unki hi hoti he jo apni umar poori kar chuke hote matlab ki jinhone apni pote potiyo ki bhi shadiya dekh li hoti hai.sabki bidhai aesa karen ka riwaz kisi bhi dharm me nahin hai.

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