Tuesday, November 24, 2009

गंथिबंधा

२२ नबम्बर २००९  ने मेरे ब्यक्तित्व को एक नया परिचय दिया. हाला की मैं इस त्यौहार मैं शामिल नहीं था मगर मेरे लिए मुझे जुडी तमाम लोग वहाँ थे. ये कुछ और नहीं मेरी सगाई थी. मेरे यहाँ के रीती रिवाजों मैं बर की उपस्थिति जरुरी नहीं होता. परन्तु बधू का होना आबस्यक है और ओ थी भी. इस त्यौहार मैं दोनों तरफ के लोग पहली बार सबसे मिलते हैं और बर की नाम की अंगूठी,चूड़ियां और गहने बधू को पहनाई जाती है. बर के तरफ से बर की माँ ये काम करके बधू को अपना बना लेती हैं. और इन सब से पहले बर और बधू एक दुसरे को पसंद करके इस रिश्ते में अपनी सहमती व्यक्त करते हैं. गहने पहनाई के बाद लड़की या लड़के के घर खाने पिने की ब्यबस्था भी किया जाता है और सब लोग खुसी मानते हैं और नयी बधू को सुखी जीवन के लिए आशीर्वाद करते हैं....
    मैं भले ही वहां नहीं था मगर मेरा मन पुरे दिन वहीँ था और मैं अपने शुख्म मन मैं इस कल्पना मैं व्यास था के कैसी लग रही होगी मेरी मोटी और कैसा होगा वो माहोल. तय किये गए कार्यक्रम के उपरांत फिल्माई गयी चलचित्र और छबी देख के मैं बड़ा खुस हुआ. लाल रंग की साडी और गहनों से सुसज्जित मोटी मेरी माँ और दादी के बिच बैठी सबका आशीर्वाद और प्यार स्वीकार रही थी. मेरे सारे प्रियजन आनंद में मशगुल थे. 

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