सागर से न हुआ वफ़ा हम से, मगर लेहेरें अस्कों के अब भी उठते है
वो बूंद थे अब सागर हैं ,और पैमाने-ऐ- मोहब्बत से .....अब छलकते हैं
वे एक समंदर खँगालने में लगे हुए हैं, हमारी कमियाँ ढूँढने में लगे हुए हैं। जिनकी अपनी लँगोटियाँ तक फटी हुई हैं, वे हमारी पगड़ी उछालने में लगे...
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