Tuesday, September 02, 2008

क्यों कोई मुझे इतना अपना बनाता है...

क्यों मांगता है दुआ कोई यूँ इस कदर मेरे लिए,
और क्यों मुझे जीने को रोज अपनी ज़िन्दगी बक्श्ता है
एक अजीब सा रिश्ता जाने क्यों ऐसा बनाया है उसने
और जाने क्यों अब तक ये निभाया है भी उसे।
हो जाता गुमनाम इन गलियों मैं एक आवारा राही की तराह
पर जाने क्यों रास्ता दिलका अपना मुझको बताया है उसने ....


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ଚଣାଚକୁଳି ଆଉ ମୁଁ ...

8.30 ହେଇଗଲାଣି ଆଉ ସେ ଘରକାମ କରୁଥିବା ଚାକରାଣୀ ତା ଏ ଯାଇଁ ଆସିନି .  କଣ କରିବ ଯେ ମଣିଷ, ଶଳା ବାଥରୁମ କୁ ଯାଇଥିବା କି ନାଇଁ ସେ ବେଲ ମାରିବ,  ନା ଯାଈ ହବ ନ ରହିହବ...