ता-उम्र करते रहे हम सजदा उसका
छुपाये जैसे गुनाह सभी लेके एक नाम उसका।
उम्र बीत गयी आंखों मैं उनके कभी जो यूँ
पढ़ पाए कभी दो लज्ज, तो बस मोहब्बत उसका
कर चले हम मोहब्बत को उसके नसीब अपना
कहर खुदा का ऐसा के देखो न हुए वो हमारे न खुदा उसका
वे एक समंदर खँगालने में लगे हुए हैं, हमारी कमियाँ ढूँढने में लगे हुए हैं। जिनकी अपनी लँगोटियाँ तक फटी हुई हैं, वे हमारी पगड़ी उछालने में लगे...
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