Monday, November 26, 2012

ख्वाबों से सवाल और मेरे जवाब

ख्वाब ही मेरे वजूद है, ज़िन्दगी तो धोखा है
ख्वाबों मैं हि जी लूँ मैं, ये भी तो एक मौका है।

रोज़ ख्वाबों मैं मेरी, खुद से मैं मिलता हूँ
और रोज़ वही एक सवाल मैं उसे पूछता हूँ

के मंजिल क्या है मेरी और क्या है ज़िन्दगी
कहती मुझसे वो के जी ले तू आज को यही है ज़िन्दगी।

इस जवाब से उसके मैं फिर जाग जाता हूँ
और खुब झगडा भी मैं उस से करता हूँ

फिर मान जाता हूँ, और एक रोज़ और जी लेता हूँ
पर पागल मन को मेरे ऐसे ही मैं भी ना मना पाता  हूँ

है यही एक उलझन और यही एक रुसवाई
जाने ज़िन्दगी मुझसे क्यूँ मुझे इस मोड़ पे है लाई 

है यही मेरी ज़िन्दगी और यही मेरे ही ख़याल
जाने फिर किस लिए रोज़ मचता है यहाँ बबाल

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