एक बार मैं एक लड़की से मिली ... एक ही बार मे मुझे लगा कुछ chemistry हैं दोनों के बीच मैं । कहीं दिल मे या दीमाग मैं जैसी घंटी सी बजी। मैं तब तक इन सब चीज़ों से कोसो दूर था। पर उस दिन लगा के नहीं ये भी जिंदगी का एक रूप है । पहले koshish किया था से चीज़ के लिए पर कुछ जमा नहीं । सारे लको की तराह मैं भी चांस मरने लगा था । जहाना भी कहीं उम्मीद की किरण दिखती मैं मैं सबसे पहले गोटा लगा देता। पर पता चला पानी ही कम है और वैसे भी मेरा हेईघ्त भी चोटी है । एक बार को लगा के मैं इसके साथ भी वैसा ही करूँ जैसा मैके करता था . पर पहली बार ही और एक भी बार मेरा मन नहीं मन . तो मने ये सब सोचने का ही ठीक नहीं समझा और उसकी निगाहूँ मैं अपने आप को खोना अछा समझा और बस डूबता ही चला गया। मैंने कबी ये नहीं सोचा के आगे क्या होगा या नहीं । मैं सोच कहाँ पाया औ तब मैंने दिल्लगी को महसूस किया और समझा के ये kya चीज़ है और क्यों इंसान इसमे अँधा हो जाता है । मैं भी खो गया कहीं उसकी झील जैसी निगाहूँ की गहराईयों मैं । मुझे लगा के ये शायद यही है जिसकी मुहे बरसो से तलाश थी औ मैं इस के लिए और ये मेरे लिए ही बनी है । मन कहाँ सोच पाया के आगे kya होने वाला है या हो सकता हैइस। मैं तो बस प्यार करता गया । रातों की नींद गवई , दिन का चैन भी खोया और जाने kya kya खोया मैं । पर इन सब के पीछे मैं एक हमसफ़र प् गया। है अलार्म बज गयी मैंऐ कहा काश कुछ देर ही सही और सपना ही सही इस दिल को सुकून मिलता।
ନିଜ ହାଡ଼ କୁ ପବ ପବ କରି ଚୁନା କରି ମୋ ମନରେ ଯିଏ ସୁନାର କଳ୍ପନା ସୃଜନ କରନ୍ତି, ମୋ ଓଠରେ ଟିକିଏ ହସ ଦେଖିବା ପାଇଁ ନିଜର ଆଖିର ତତଲା ଲୁହକୁ ଦେହର ଶିତଳ ଲହୁ ସହିତ ଯେ ମିଶାଇ ଚାଲିଥାଆନ୍ତି... ନିଜ ଜ଼ିବନର ସୁଖ ସଳିତାକୁ ତିଳ ତିଳ କରି ଜାଳି ମୋ ଜୀବନର ଚଳପଥକୁ ଆଲୋକିତ କରିବାରେ ଯିଏ ବ୍ୟସ୍ତ, ମୋତେ ମଣିଷ ପରି ମଣିଷ କରି ଗଢି ତୋଳିବା ପାଇଁ ଯିଏ ସର୍ବଦା ବ୍ୟଗ୍ର... ସେଇ ପରମ ପୂଜନୀୟ ମା ବାବାଙ୍କ ପାଦପଙ୍କଜରେ ଭକ୍ତି ଅର୍ଘ୍ୟ ଅର୍ପଣ
Saturday, July 12, 2008
ख्यालों मैं
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