Tuesday, July 15, 2008

सपनो की कीमत


मैं रोज़ बहुत लोगों से मिलता हूँ और ये जानने की कोशिश करता हूँ के क्या वो खुस हैं । और आज कल मैं बहुत उत्साहित हूँ के लोग बहुत कूच हासिल कर लेना चाहते हैं। अपने आप को खुस करने के लिए वो बहुत प्रयास कर रहे हैं । मुझे याद है मैंने किसी एक फिल्मी हस्ती को रेडियो पर ये कहते हुए सुना था के उनके वक्त लोग अपने से ज्यादा दूसरे के भावनायों की कदर करते थे और आज कल के लोग बहुत ज्यादा स्वर्थ्पर हो चुके हैं। उनके लिए सब से पहे ख़ुद अपनी खुसी का महत्वा बहत ज्यादा है। और मैं सोचता हों क्या सच मैं ऐसा हुआ है । क्या आज के लोगो मैं ऐसे भावना है ... मैं इस संदार्व मैं बहुत लोगों से पुचा भी कुछ उछाविलाशी युवाओं ने इस बात का समर्थन किया और ये कहा के " हाँ क्यों ना हो जब हम १० घंटे की जी तोड़ मेहनत करने के बाद जिंदगी का मज़ा लेने का हक को किसी के लिए क्यों गवाएं ..हमें भी तो अपनी जिंदगी जीने का हक है " । मैं सोचता हूँ ये भी ठीक है। पर दूसरो की भावनाओं की कदर भी करनी चाहिए ... कुछ बुजुर्ग लोगों से पुचा तो उन्होंने युवा पीढी को लताड़ते हुए बहुर बुरा भला कहा। शायद वे लोग अपने समय से तुलना करते है और किसी चीज़ की कमी उनके भावनाओं ही महत्वा को थोड़ा कम कर रही है जिस के लिए उनकी इस टिपण्णी को वो सही बताते हैं। खैर जीवन मे खुसी की एहमियत कूच ज्यादा ही बढ़ गयी है । आज की युवा पीढी बड़ी बड़ी उपलब्धियों के पीछे रोज़ मर्रा की चोटी चोटी खुसियूं के लिए तरस रहे हैं । ये शायद इस लिए हो रहा है की लोगों के सपने और सोचने की सीमा बहुत बढ़ गया है और उनकी कीमत भी। आज कल महंगाई की तराह सपनो की कीमत भी बढ़ गया है। पहले जो लोग छोटे भाई की आने पे खुश होते थे आज वो भाई ने अछा उपहार नहीं लेन के कारन दुखी होना अपना नसीब मानते हैं। और अपने इस निष्पत्ति को सारे लतीफों से सही साबित भी कर लेता है और अपनी खुसी की कीमत ख़ुद अपने ही नज़रों मैं बढ़ा लेता हैं .... बाह रे इंसान और बाह रे तेरे सपने ...

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Adab se..

वे एक समंदर खँगालने में लगे हुए हैं, हमारी कमियाँ ढूँढने में लगे हुए हैं। जिनकी अपनी लँगोटियाँ तक फटी हुई हैं, वे हमारी पगड़ी उछालने में लगे...