Monday, July 07, 2008

this is not mine...

हिज्र मौसम मे ये बारिश का बरसना कैसा

एक सेहर से समंदर का गुज़रना कैसा

आएमेरे दिल न परेशां हो, तनहा हो कर

वो तेरे साथ चला कब था, बिचारना कैसा ?

लोग कहते है गुलशन की तबाही देखो
मैं तो बीरन सा जंगल था ,उजारना कैसा ?

देखने मे तो कोई दर्द नहीं,दुःख भी नहीं

फिर ये आँखों मे यूँ अस्कून का उभारना कैसा

बेवफा कहने का जूरत भी न करना उसको

उसने इकरार किया कब था,मुकरना कैसा ???

No comments:

Post a Comment

ଚଣାଚକୁଳି ଆଉ ମୁଁ ...

8.30 ହେଇଗଲାଣି ଆଉ ସେ ଘରକାମ କରୁଥିବା ଚାକରାଣୀ ତା ଏ ଯାଇଁ ଆସିନି .  କଣ କରିବ ଯେ ମଣିଷ, ଶଳା ବାଥରୁମ କୁ ଯାଇଥିବା କି ନାଇଁ ସେ ବେଲ ମାରିବ,  ନା ଯାଈ ହବ ନ ରହିହବ...