
वही श्याम वही रात और वही चांदनी
कुछ अलग है तो बस, ये बहती आँखें
इनमे तन्हाई और चाहत मे का बसेरा ...
कितने गुज़रे पर आज भी एक सावन बसा रखा है
वे एक समंदर खँगालने में लगे हुए हैं, हमारी कमियाँ ढूँढने में लगे हुए हैं। जिनकी अपनी लँगोटियाँ तक फटी हुई हैं, वे हमारी पगड़ी उछालने में लगे...
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