Wednesday, August 06, 2008

झम झम बरसे

केह्दो उन फिजाओं से बरसना है तो झम झम बरसे

बूंदों के मोहताज़ हो वो हम नहीं ,

हमने तो समंदर आँखों मे पाला है

अब दरिया की गहराई काफी नही

* * *


2 comments:

Adab se..

वे एक समंदर खँगालने में लगे हुए हैं, हमारी कमियाँ ढूँढने में लगे हुए हैं। जिनकी अपनी लँगोटियाँ तक फटी हुई हैं, वे हमारी पगड़ी उछालने में लगे...