
सदियों से लंबे रातें और ये यादों का केहर, अब न सहा जाए
आज भी है खयालो मैं उनके ही लतीफें और फरमान
और है कुछ बातें भी वही और यादें भी उनके,
बदले खुदाया कुछ तो मेरा रब मुझे कबूल ही ना करे
वे एक समंदर खँगालने में लगे हुए हैं, हमारी कमियाँ ढूँढने में लगे हुए हैं। जिनकी अपनी लँगोटियाँ तक फटी हुई हैं, वे हमारी पगड़ी उछालने में लगे...
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