मेह्फ़ुज़ दिल मे मेरे इन यादों से पूछो के कौन है इनका रेहनुमा
कैद है जो इनके बाजूओं के दरमियान वो ही तो है मेरी महबूबा...
था जो गुलाम् मैं कभी किसी के जुल्फों का और था कभी उनका खुदा
वक्त का ये आलम तो देखो खुद खुदा भी उनका फरियादी से कम नहीं
वे एक समंदर खँगालने में लगे हुए हैं, हमारी कमियाँ ढूँढने में लगे हुए हैं। जिनकी अपनी लँगोटियाँ तक फटी हुई हैं, वे हमारी पगड़ी उछालने में लगे...
No comments:
Post a Comment