Thursday, January 27, 2022

समय पानी के जैसा बह गया है।  यूँ तो जीवन भी अपने गंतब्य पथ पर आगे बढ़ गया है पर फिर भी कुछ न कर पाने का एक दुखद अनुभव मन मस्तिस्क में चुभ रहा है।  और वो है अपने जगह और अपने लोगों के लिए कुछ न कर पाना।  

समय के साथ दादा दादी दोनों परलोक सिधार गए.. और चाचा अब अपने स्वार्थ के लिए पिता सामान बड़े भाई से भी बत्तमीजी करने से बाज  नहीं आ रहा।  पैसा और संपत्ति के समक्ष वो भावनाओ और रक्त संपर्क भूल गया है।  भगवान् सद्बुद्धि दे अन्यथा हम भाइयों को ही उसे सत्मार्ग में लाना पड़ेगा।  

Adab se..

वे एक समंदर खँगालने में लगे हुए हैं, हमारी कमियाँ ढूँढने में लगे हुए हैं। जिनकी अपनी लँगोटियाँ तक फटी हुई हैं, वे हमारी पगड़ी उछालने में लगे...