Saturday, January 03, 2015

रिश्तों से बंधा,वो मेरा हजुर …

फ़ोन की घंटी से आँखें खुली और माँ ने पुछा के.…  पहंचा के नहीं ,  खाना क्या बनायेगा. 
मैंने कहा के पत्ता गोबी की सब्जी … 
फिर जो जवाब मुझे मिला उस से मैं दो मिनिट तक सोच मैं पड़ गया … 
माँ बोली के तुझे तो पत्ता गोबी पसंद नहीं फिर कैसे बनाएगा और खाएगा … 

मैं बताना चाहूंगा की मैं २००१ के बाद घर में कभी भी १० दिन से ज्यादा रहा नहीं। कॉलेज के बाद पीजी और फिर नौकरी … 

पर आज भी उसे मेरी एक एक पसंद और नापसंद बारीकी से याद है … यही असली दौलत है मेरी ... 
    

रात साढ़े आठ बजे ऑफिस से घर पहंचा, थका हुआ था और बैठ गया। मुझे पता नहीं चला के मैं कब सो गया था।  फ़ोन की घंटी बजी तो उठा और खुद को वही ऑफिस फॉर्मल्स और जूतों का साथ सोफे पे आधा ऊपर और आधा लटकते हालात मैं पाया।   पर माँ की दो टूक बातों ने मुझे रिफ्रेश कर दिया था...  पांच मिनिट पुराने दिन याद करके बैठा रहा फिर मस्त खाना बनाया ,ठूस के खाया और सो गया… 


कई रिश्तों से बंधा और कसा हुआ हूँ मैं यूँ मगर  
रूह का सुकून पहँचायें और करे मरहम भी, वो मेरा हजुर … 

No comments:

Post a Comment

Its Shambhoo's First Day in Pre-School

Its in golden words now.  Starting today (3rd jan 2018) my baby went to Pre-school and by gods grace its a golden day for me. We all wer...