Monday, January 28, 2013

एहसास के सहारे...

हर रोज़ बिखरे यादें समेटने दूर बहत दूर चला मैं जाता हूँ 
फिर भटके हुए खुदको धुंडता हुए उसे अपने करीब पाता हूँ 


जाने वो भी, कितनी कसक दिल में लिए खुदको मुझमे छिपाती है 
और यूँ खोये मेरे भी कुछ अरमान रोज़ छेड़ जाती है 

यूँ तो ना यादों मैं कुछ मिलता मुझे और न खयालो मैं 
पर इन्हीं कुछ एहसास के सहारे तो ये ज़िन्दगी चलता है।

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Samajh jata hun teri khamoshi magar..

Samajh leta hun main  khamoshi teri magar , Rok lun chahat ko apni ye bhi tujhse suna hai.