Tuesday, October 09, 2012

क़ब्रें भी यहाँ चैन की तलाश मैं हैं

एक सुस्त  रविवार को मैं सब्जिओं की तरह पड़े पड़े टीवी के चैनलों पर अपना पता पटक रहा था के मेरी नज़र एक प्रोग्राम पर रुक गया। आधे घंटे की उस प्रोग्राम ने जैसे एक सोई हुई आवाज को सांसें दे गयी। उस प्रोग्राम का केंद्रबिंदु था kashmir जो की पिछले कई दसको से भारत और पाकिस्तान के बीच एक बिबाद और समस्या बनी हुई है। पर मेरा यह लेख उस समस्या से कोसो दूर है। यह मेरा लेख किसी व्यक्ति बिसेष के ऊपर आधारित नहीं है और ना ही मैं इसमें किसीको सही या किसीको गलत ठहराना चाहता हूँ। कहानी है कुछ ऐसे बदनसीबों की जीको आज उनके मृत्यु के कई साल के बाद भी उनके हक की जमीन नसीब नहीं हुई है। कहानी है ये उन हज़ारों लोगों की जो आज भी सरकारी दस्ताबेजों मैं लापता हैं और जिनकी तलाश उनकी परिजनों को आज भी है। बास्ताबित स्थिति क्या है उसपे किसी भी प्रकार के निर्णय पर पहंचने से पहले मैं बस इतना कहूँगा के 


ढूँढता  है कौन कब्र मैं गुनाहों के नासूर 
जीना ही यहाँ, एक गुनाह है ...


Kashmir, किताबों मैं कभी पढ़ा करता था के धरती का स्वर्ग है , आज वो किताबें ही नहीं है। मज़हब की आग मैं क्या कहानी अब किताबें ही नहीं है। मैंने तो बस सुना है और पढ़ा है की कभी किसी ज़माने मैं किसी ऋषि माराज के नाम से पड़ा था इसका नाम kashmir मगर आज कोई लेता है कश्मीर तो सिर्फ नफरत ही नफरत सुनने को मिलता है। आतंकवाद और सियासत दोनों की मार से कश्मीर आज जिंदा तो है मगर है एक कब्र मैं। चाहे वो सेना हो या हो आतंकवादी मरता तो आदमी है। पहले पडोसी मुल्क ने नफरत बोया था जो आज अफगानिस्तान उसपे कहर बरसा रहा है और आज जो हमारी सेना है आतंकवाद के खिलाफ जंग मैं मनो जैसे आग बरसा रही है। 

सुना है ऐसे कई हज़ार कब्र है कश्मीर मैं जिनमे कौन दफन है और उसे किसने दफन किया है उसका कोई लेखा जोखा नहीं है। भले चाहे वो कोई आतंकवादी हो या फिर कोई मुखबीर या कोई भी ऐसा जो देश के खिलाफ षड़यंत्र मैं शामिल हो उसके खिलाफ ऐसी करवाई, क्या सही है ? इस चीज़ से भी इनकार नहीं किया जा सकता की वोह कोई आम आदमी भी हो सकता हो और जिसका इन सब से कोई सम्बन्ध हो उसकी भी हत्या हुई हो। मगर मूल तरह से मुर्दों के साथ ऐसा ब्याभार क्यूँ ? 

कोई बेटा जिसने अपनी पिता को पहचानना भी सुरु किया था और उसका पिता लापता है, वो आज भी इसी आस लिए बैठा ही की उसके पिता आयेंगे एक दिन। दो दसकों से ज्यादा कोई स्त्री अपनी पति के इंतज़ार में दिन काट ताहि है। ऐसे मनो हज़ारों है जिनका कोई न कोई आज भी लापता है और उन्हें आज भी उनका इंतज़ार है। जीवन तो मृत्यु से भी बत्तर हो गयी है आज वहां मगर मृत्यु के बाद तो किसी इंसान को कब्र मैं भी चैन नहिंमिलती दिख रहा है। 

बस एक गुज़ारिश है सभी लोगों से जो भी इस के लिए जिम्मेदार है की अब भी सभाल जाओ और जीने दो जिंदगियों को और सोने दो मुर्दों को। जाएं कब वो दिन आएगा जब सियासी और आतंकवादी भी समझेंगे ज़िन्दगी की ये सच्चाई जो मौत से ख़तम होती है। पर मुझे लगता है की कश्मीर मैं जहाँ मुर्दें भी चैन तलाश रहे हो वह यह होने को अब भी वक़्त लगेगा। 

भगवन सबको सद्बुद्धि और बिचारशील बनाएं ...

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