Wednesday, March 28, 2012

दिल तो पागल है

यह मन भी चीज़ क्या है कभी कभी मैं समझ नहीं पता हूँ. पल मैं ये खुस होता है और पल मैं दुखी और इसे यह करने के लिए कोई वज़ह या कारण की जरुरत होती है यह मुझे नहीं लगता. क्यों की मन मेरा अपने आप मैं एक आज़ाद पंची की तरह है और कहाँ ये मेरे काबू मैं आया है जो मैं इसे समझ पाउँगा. आज ही की बात ले लीजिये... सुबह निकला था तो खुस था और अभी दुखी हूँ पर क्यूँ .. ये सोचोन्न तो जवाब कुछ नहीं मिलता मुझे.. 

आप समझ रेह होंगे की ये साला पगला गया है और सुबह सुबह चढ़ा राखी है तो मैं आपको ये बतादूँ के मैं चढ़ता नहीं और ना ही पगलाया हूँ. पर करूँ  तो क्या करूँ ये साला ढक्कन दिल भी अपनी चलता है , सुनता भी नहीं.. इसको इसकी मर्जी जो चलानी होती है मुझपे.. 

खैर ये बड़ा ही पेचीदा सवाल है जिसका जवाद लोग सदियों से ढून्ढ रहे हैं  तो मैं किस खेत की मूली या गाज़र हूँ जो मुझे पता चल जायेगा.. पर एक बात तो है उपरवाले ने भी क्या चीज़ बनाया है - दिल और क्या क्या क्या खयालात भरे हैं इस्मा.. वह रे उपरवाले तेरा जवाब नहीं ...

No comments:

Post a Comment

Social network is not only Social now, its personal and beyond 👍 👍

There has been much discussion on the use of social media and its effect on individual's health. But when there is more than a billion...