तुझ सी सूरत नहीं मिलती मुझे लाखों मैं
आज कल नींद नहीं अति है माँ रातों मैं !
वही दीवार वही दर वही बिस्तर है
पर कोई नहीं खड़ा पानी लिए हाथों मैं !
चाँद तारे नहीं अब और न परियों का हुजूम
मुख़्तसर लोरी नहीं गाता कोई रातों मैं !
दिन गुजर जाता हैं भीड़ मैं तनहा तनहा
अस्क भरी होती है आँख बातों बातों मैं !
देर से आने पर अब कौन नसीहत देगा
कौन दे हौस्लान मुश्किल मुलाकातों मैं !
तू तो कहती थी मेरे बिना कहीं नहीं जाएगी
क्या हुई भूल मुझे छोड़ा फसादतों मैं!
तर्जुमानी मैं तेरे प्यार की कैसे कर दूँ
माँ तू मुश्किल है ढालना खयालातों मैं !
कतरा कतरा है लहू मेरा तेरे कर्जे मैं
तेरा मुजरिम हूँ खड़ा हाथ लिए हाथो मैं !
रंज इस बात का जीने नहीं देता मुझको
कुछ कमी रह गयी थी मेरे ही ज़ज्बातों मैं !
तू गयी, छोड़ गयीं मुझे जहाँ की खुशियाँ
एक सन्नाटा सा रहता हैं सियाह्रतों मैं !
अब चली आ या बुलाले मुझे भी पास अपने,
मेरा दिल भी भर गया रिश्तों की खुराफातों मैं !!
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