Monday, November 28, 2011

आज कल नींद नहीं अति है माँ रातों मैं !

तुझ सी सूरत नहीं मिलती मुझे लाखों मैं
आज कल नींद नहीं अति है माँ रातों मैं ! 

वही दीवार वही दर वही बिस्तर है
पर कोई नहीं खड़ा पानी लिए हाथों मैं !

चाँद तारे नहीं अब और न परियों का हुजूम
मुख़्तसर लोरी नहीं गाता कोई रातों मैं !

दिन गुजर जाता हैं भीड़ मैं तनहा तनहा
अस्क भरी होती है आँख बातों बातों मैं !

देर से आने पर अब कौन नसीहत देगा
कौन दे हौस्लान मुश्किल मुलाकातों मैं !

तू तो कहती थी मेरे बिना कहीं नहीं जाएगी
क्या हुई भूल मुझे छोड़ा फसादतों मैं!  

तर्जुमानी मैं तेरे प्यार की कैसे कर दूँ
माँ तू मुश्किल है ढालना खयालातों मैं !

कतरा कतरा है लहू मेरा तेरे कर्जे मैं
तेरा मुजरिम हूँ खड़ा हाथ लिए हाथो मैं !

रंज इस बात का जीने नहीं देता मुझको
कुछ कमी रह गयी थी मेरे ही ज़ज्बातों मैं !

तू गयी, छोड़ गयीं मुझे जहाँ की खुशियाँ
एक सन्नाटा सा रहता हैं सियाह्रतों मैं !

अब चली आ या बुलाले मुझे भी पास अपने,
मेरा दिल भी भर गया रिश्तों की खुराफातों मैं !!


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